पिया को जो न मैं देखूँ

Saini Sa'aB

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पिया को जो न मैं देखूँ
सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ,
कि जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहाँ से लाऊँ मैं ऐसी अँखियाँ।
दिलों की बातें दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं,
वो सुनना चाहें जुब़ाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ।
ये इश्क या है, ये इश्क या है, ये इश्क या है, ये इश्क या है,
सुलगती सांसें, तरसती आँखें, मचलती रूहें, धड़कती छतियाँ।
उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की खुशबू,
किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ।

मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो, कि तुमने देखा है पी को आते,
न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटकी कलियाँ।
 
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