दूर पर अलकापुरी

Saini Sa'aB

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दूर पर अलकापुरी मेघ गंभीर नदी पर यों झुका आकुल हुआ,
कूल मानो मिल गया उसकी असिंचित प्यास को
जब लगा नभ से बरसने प्यार ही जल धार में,
गंध व्याकुल कर गई मेरी विमूर्छित श्वास को

पंख लेकर कल्पना के मैं उड़ा उस लोक तक,
जब किसी बीते हुए आषाढ़ की सुधि आ गई
यक्षिणी की देह-वल्ली तृप्त हो रस धार से,
मेघ-से अपने पिया का गूढ़ चुंबन पा गई

एक विद्युत-सी छिटकती देह के आकाश से,
स्पर्श से जन्मे पुलक के झनझनाते राग-सी
बूँद भी प्यासी स्वयं थी पी रही थी रूप को
मेंह से जो और भड़की वह सुनहली आग थी

यक्ष शापित रामगिरि का पर उपेक्षित ही रहा,
झिलमिलाती स्वप्न-सी है दूर पर अलकापुरी
पोंछते हैं अश्रु ही उसकी प्रिया के चित्र को,
सिसकियों में डूब जाता गीत उसका आखिरी

फूल धर कर देहरी पर गिन रही जो रात-दिन,
आँख में तिरती रही वह शिशिर-मथिता पद्मिनी
मलिनवसना हो गई ज्यों चंद्रिका बिंबाधरा,
भटकती सुनसान में ज्यों एक क्षमा रागिनी

 
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